Spiritual understanding of id-ul-zuha!!!

             ☆~☆~☆ ईद-उल-अजहा का रूहानी राज़ ☆~☆~☆

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इस्लाम धर्म में ईद-उल-अजहा एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जिसका अर्थ है बुराइयों का त्याग। ये त्योहार मुस्लिम समाज द्वारा उनके पाक धार्मिक स्थल मक्का, जो सऊदी अरब में स्थित है, की पाक यात्रा अर्थात ‘हज़’ के बाद मनाया जाता है। इस त्योहार का पहला दिन दुहल-हिज्जा के दसवें दिन मनाया जाता है, जो मुस्लिम वर्ष का अंतिम महीना है। ज़्यादातर हिस्सों में ईद-उल-अजहा अर्थात कुर्बानी का ये त्योहार कई दिनों तक मनाया जाता है।

इस दिन अल्लाह की राह में बकरे की कुर्बानी देते हैं। लेकिन यहाँ यह सोचने वाली बात है कि वह अल्लाह ही हम सबकी ज़िंदगी बख्शने वाला है। उनकी नज़रों में सभी इंसान बराबर हैं। तब वह कैसे बकरे जैसे एक मासूम मख्लूक (प्राणी) की कुर्बानी का हुक्म दे सकता है? अगर ये बात सच होती तो अल्लाह को रहमदिल, हमदर्द या पूरी दुनिया को खैरत देने वाला (विश्व परोपकारी) कैसे कहा जा सकता था?

बकरे की कुर्बानी देकर अल्लाह को खुश नहीं किया जा सकता। लेकिन अब सवाल उठता है कि अगर अल्लाह बकरे या किसी अन्य प्राणी की कुर्बानी नहीं चाहता तो आखिर वह हमसे कैसी कुर्बानी चाहता है?
इस बात पर अगर गहराई से विचार करें तो हमें इसका जवाब मिल जाएगा। ईद-उल-अजहा के पवित्र दिन पर बकरे की कुर्बानी के पीछे ज़रूर कोई कारण छिपा हुआ है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि जब कोई बकरी मिमियाती है तो ऐसा बा ज़ाहिर (प्रतीत) होता है मानो वह मैं-मैं कह रही है। ‘मैं’ एक हिन्दी शब्द है, जिसका अर्थ है मैं अमुक व्यक्ति। इस प्रकार खुदा हमसे ‘मैं’ और ‘मेरा’ शब्द की कुर्बानी चाहते हैं। ये दो शब्द ही हमारे अहंकार का मूल कारण है, जो हमें पतन की ओर ले जाते हैं। (जारी है)
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